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خزان زرد می رود، بهار سبز می رسد، ( اعظم خجسته )
پیچک ( اعظم خجسته ) خواجه اف
شعر و اداب پارسی



نوشته شده در تاريخ سه شنبه 21 بهمن 1393 توسط سید مجتبی محمدی |

 

بهار سبز می رسد

خزان زرد می رود، بهار سبز می رسد،
به سرزمین روح و جان خمار سبز می رسد.

ز اضطراب بادها حدیث رفته را مگو،
به مرز سرخ انتظار قرار سبز می رسد.

به محور زمین نگر، که از سمای هفتمین
به افتخار خاکیان مدار سبز می رسد.

کمند زلف تابدار ز قصد قلب ها بگیر
به یمن دام و دار تو شکار سبز می رسد.

دگر سر آمد انتظار، بیا که جمعه ی دگر،
سوار اسب بادپا نگار سبز می رسد.

 

 

اعظم خجسته
 

 

 

 

 

 

 

Савори сабз


Хазони зард меравад, бахори сабз мерасад
Ба сарзамини руху чон, хумори сабз мерасад

Зи изтироби бодхо хадиси рафтаро магу
Ба сарзамини интизор карори сабз мерасад

Ба мехвари замин нигар, ки аз самои хафтумин
Ба ифтихори хокиён мадори сабз мерасад

Каманди зулфи тобдор зи касди калбхо бигир
Ба юмни дому дори ту шикори сабз мерасад

Дигар сар омад интизор, биё ки чумъаи дигар
Савори асби бодпо, нигори сабз мерасад

 

Аъзам Хучаста

http://doriush.persianblog.ir/1388/9/

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