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وقتی که صبح خنده می کرد ( اعظم خجسته )
پیچک ( اعظم خجسته ) خواجه اف
شعر و اداب پارسی



نوشته شده در تاريخ پنجشنبه 16 بهمن 1393 توسط سید مجتبی محمدی |

 

رای  ا. ک.
وقتی که صبح  خنده می کرد
و تیغ خورشید چادر تاریکی را  می درید
این ابر  بهاری  بود که  گریه می کرد
و زلال  دیدگانش
گونه های  زمین را  می شست که می شست.
اما  این  گریه تلخ نبود
و شیرین هم نبود،
فقط از نوازش باد
که گیسوان عریان مجنونبید به رقس آمده بودند
درک  می کردم  که  زندگی  تولد می شود.
همان تولدی که
تولدی دیگر گفته اند.
و این رستن  بوته ی   شعر  است
در صحرای که با  این  همه  آب خشکیده....

 

 


اعظم خجسته

 

 

 

 


 
Барои А.К

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Вакте ки  субх  ханда мекард
Ва теги хуршед пардаи  торикиро медарид
Ин абри  бахори  буд , ки гиря  мекард
Ва зулоли  дидагонаш
Гунахои заминро мешуст ки мешуст
Аммо  ин  гиря
Талх  набуд
Ва  ширин  хам  набуд
Факат  аз  навозиши бод
Ки гесувони урёни  мачнунбед  ба ракс омада буданд
Дарк мекардам,ки зиндаги  таваллуд мешавад
Хамон таваллуде , ки
Таваллуде дигар  гуфтаанд
Ва ин рустани  бутаи  шеър  аст
Дар сахрое ,ки бо  ин  хама  об  хушкида

 

 

Аъзам Хучаста

http://doriush.persianblog.ir/1386/1/

 

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