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ای خانم ديماهی مارا تو بهار استی ( اعظم خجسته )
پیچک ( اعظم خجسته ) خواجه اف
شعر و اداب پارسی



نوشته شده در تاريخ چهارشنبه 15 بهمن 1393 توسط سید مجتبی محمدی |

لطف شهنشاهی
 
 برای  م.
 
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ای خانم ديماهی  مارا  تو بهار استی
ای لطف  شهنشاهی شهدی و خمار  استی

تو ترکی و ما تاجيک، تو خوشگل و ما عاشق
ترکانه کشی  مارا   به - به  چه  نگار  استی.

ما در ره تو فرديم نه ز روی  هوسبازی
دانم که نمی دانی،دانی که نه يار  استی.

ما صيد توييم  بنگر  زولانه  به پا داريم
در دام  توييم از چه  در قصد شکار استی.

گاهی گذری از ما ناديده و بی پروا
پيوسته شتابانی،تو تندسوار استی.

هر  صحبت  تو  مارا  بر  خويش  نماياند
آيينه  ما  هستی،بی گردو غبار استی.

تهران و دوشنبه را پيوند  دهيم با هم
تو  حلقه  وصل ما  نه  حلقه  دار  استی.
 


 اعظم خجسته

 


ЛУТФИ  ШАХАНШОХИ     
Барои  М
 

 

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Ай хонуми  даймохи  моро  ту  бахор  асти
Ай  лутфи  шаханшохи,шахдиву  хумор  асти

Ту  туркиву  ман  точик,ту  хушгилу  ман  ошик
Туркона  куши  моро,бах-бах  чи  нигор  асти

Мо  дар  рахи  ту  фардем,н-аз руи  хавасбози
Донам,ки немедони,дони,ки на  ёр  асти

Мо  сайди  туем  бингар,завлона  ба  по  дорем
Дар  доми  туем,аз  чи  дар  касди  шикор  асти

Гохе   гузари  аз  мо нодидаву  бепарво
Пайваста  шитобони,ту  тундсавор  асти

Хар  сухбати  ту  моро  бар  хеш  намоёнад
Оййина  мо хасти,  бе  гарду  губор  асти

Техрону  Душанберо  пайванд  дихем бо хам
Ту  халкаи  васли  мо,на  халкаи  дор  асти
 


Аъзам Хучаста

 http://doriush.persianblog.ir/1385/4/

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